🔥 शिवाजी महाराज के अंतिम दिन और अमर विरासत :

इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जो केवल एक राजा की नहीं बल्कि पूरे युग की दिशा बदल देते हैं।
क्या आपने कभी सोचा है – इतना पराक्रमी राजा, जिसने औरंगज़ेब की नींव हिला दी, समुद्र पर किला बनवाए, जिसने एक हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की… वह कैसे अचानक दुनिया छोड़ गया?
क्या यह केवल बीमारी थी, या इसके पीछे कोई और रहस्य छिपा है?

“रायगढ़ किला के पृष्ठभूमि में भगवा ध्वज और तलवार के साथ शिवाजी महाराज के अंतिम दिन और विरासत का प्रतीकात्मक चित्र”

⚔️ अंतिम दिन :

साल था 1680 (चैत्र शुद्ध प्रतिपदा)
शिवाजी महाराज रायगढ़ किले पर थे। यह वही स्थान था जहाँ उनका भव्य राज्याभिषेक हुआ था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी थी।

  • महाराज को तेज बुखार और रक्तपित्त (Dysentery) की शिकायत हुई।
  • दरबारी वैद्य और हकीम उनकी सेवा में लगे रहे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी तबीयत बिगड़ती गई।
  • राजमाता जीजाबाई का देहांत पहले ही हो चुका था, औरंगज़ेब दक्षिण पर चढ़ाई की तैयारी कर रहा था।

कुछ मराठी बखरी में लिखा है कि महाराज को अचानक तेज ज्वर और पाचन तंत्र की गंभीर बीमारी हुई थी।
किंतु लोकमान्यता में यह भी कथा है कि महाराज को जहर दिया गया था। इस बात पर इतिहासकारों में मतभेद है।

आख़िरकार 3 अप्रैल 1680 को रायगढ़ किले पर हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक ने अंतिम श्वास ली।


🏰 मृत्यु के बाद का माहौल :

महाराज की मृत्यु के साथ ही दरबार में हलचल मच गई।

  • उत्तराधिकार को लेकर संभाजी महाराज और राजाराम के बीच विवाद खड़ा हुआ।
  • औरंगज़ेब ने इस घटना को अपने लिए वरदान समझा और दक्षिण की ओर और भी तेज़ी से बढ़ा।
  • किंतु, महाराज के आदर्श और उनकी युद्धनीति ने मराठा साम्राज्य को अंत तक जीवित रखा।

🌟 विरासत (Legacy) :

शिवाजी महाराज केवल एक राजा नहीं थे, बल्कि एक विचार थे।

  • उन्होंने हिंदवी स्वराज्य का जो बीज बोया, वही आगे चलकर मराठा साम्राज्य के रूप में औरंगज़ेब की मुग़ल सत्ता को खत्म करने का कारण बना।
  • उनकी गनिमी कावा (गुरिल्ला युद्धनीति) आज भी विश्वभर की सैन्य अकादमियों में पढ़ाई जाती है।
  • विदेशी यात्रियों ने भी उनकी वीरता का वर्णन किया है। फ़्रेंच लेखक Abbé Carré और अंग्रेज़ लेखक Fryer ने शिवाजी को “भारत का सबसे महान राजा” कहा है।

📜 ऐतिहासिक प्रमाण :(Legal/Authentic Proofs)

  1. सबासद बखर (1697) – जिसमें शिवाजी महाराज के जीवन और मृत्यु का प्रथम प्रामाणिक विवरण मिलता है।
  2. चिटनिस बखर – इसमें उनके अंतिम दिनों का विस्तृत वर्णन है।
  3. अभ्यंकर व ग्रांट डफ की रचनाएँ – Shivaji की मृत्यु को Dysentery (आँतों की बीमारी) से जोड़ते हैं।
  4. विदेशी यात्रियों की डायरी – इंग्लिश और फ़्रेंच यात्रियों ने लिखा कि शिवाजी महाराज बीमारी से ग्रस्त थे।
  5. महाराष्ट्र राज्य अभिलेखागार (Pune) – इसमें उपलब्ध शिलालेख और दस्तावेज़ उनकी मृत्यु और अंतिम संस्कार की पुष्टि करते हैं।

✅ निष्कर्ष :

शिवाजी महाराज का निधन अचानक हुआ, लेकिन उनकी विरासत अमर रही।
उनका जीवन एक प्रश्नचिन्ह छोड़ गया –
“क्या उन्हें बीमारी ने हराया, या किसी षड्यंत्र ने?”

लेकिन सच्चाई चाहे जो भी हो, शिवाजी महाराज एक विचार बनकर आज भी जिंदा हैं, और हर भारतीय के हृदय में उनका स्वराज्य जीवित है।

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