“भगवान या राजनीति? वैश्य जाति का सच…”
“क्या वैश्य जाति को किसी खास भगवान ने बनाया था? या यह केवल धर्म और राजनीति का खेल था? जब हम असली ग्रंथों की परतें खोलते हैं, तो सामने आता है एक ऐसा सच जो सदियों से छुपाया गया है…”

वैश्य–Vaishya :-
📜 असली इतिहास और उत्पत्ति :
- वैश्य जाति का उल्लेख ऋग्वेद (पुरुषसूक्त), मनुस्मृति और महाभारत में मिलता है।
- यह किसी साल या व्यक्ति द्वारा नहीं बनाई गई थी, बल्कि वर्ण व्यवस्था का हिस्सा थी।
- वैश्य को समाज का आर्थिक स्तंभ माना गया – कृषि, व्यापार और पशुपालन उनका मुख्य कार्य था।
🕵️ रहस्य और राजनीति :
- मूल रूप से यह वर्ण था, जाति नहीं।
- समय के साथ इसे कठोर जाति में बदल दिया गया ताकि सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण रखा जा सके।
- जातिभेद का असली कारण धर्म नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक हित थे।
⚖️ आज की भ्रांतियाँ और भ्रष्टाचार :
- आज कई लोग मानते हैं कि वैश्य जाति केवल व्यापारी या बनिया है – यह गलत है।
- असलियत: वैश्य समाज ने भारत की अर्थव्यवस्था और व्यापार को खड़ा किया।
- भ्रांतियाँ और जातिभेद आज भी इसलिए हैं क्योंकि लोग इतिहास का सच नहीं जानते।
- भ्रष्टाचार: जाति का इस्तेमाल राजनीति और वोट बैंक के लिए किया जाता है।
🙏 भगवान को लेकर भ्रांतियाँ और सच :
- गलतफहमी: कई लोग मानते हैं कि वैश्य जाति को किसी खास भगवान ने बनाया या यह जाति केवल लक्ष्मी पूजा या कुबेर पूजा करती है।
- सच:
- वैश्य समाज परंपरागत रूप से भगवान विष्णु और उनके अवतारों (विशेषकर कृष्ण) को मानता है, क्योंकि व्यापार, कृषि और गोपालन से उनका सीधा संबंध है।
- लक्ष्मी को धन की देवी मानकर पूजा की जाती है, लेकिन यह जाति की पहचान नहीं, बल्कि आर्थिक जीवन का प्रतीक है।
- कुबेर को धन के देवता माना जाता है, लेकिन यह भी प्रतीकात्मक है।
- असलियत: किसी जाति को भगवान ने नहीं बनाया। भगवान सबके हैं, जाति-विशेष के नहीं।
- अंधश्रद्धा मिटाने का संदेश:
- भगवान को जाति से जोड़ना गलत है।
- धर्मग्रंथों में कहीं भी यह नहीं लिखा कि भगवान ने जातियाँ बनाई।
- जाति केवल समाज की कार्य-व्यवस्था थी, जिसे बाद में राजनीति ने कठोर बना दिया।
🌍 जातिभेद क्यों जारी है?
- शिक्षा की कमी और पुरानी मान्यताओं का गलत प्रचार।
- राजनीति द्वारा जाति को हथियार बनाना।
- समाज में असमानता को बनाए रखने की कोशिश।
👉 असली सच यह है कि भगवान सबके हैं, जाति किसी की पहचान नहीं। इंसानियत और योगदान ही असली पहचान है।
🏆 निष्कर्ष :
वैश्य जाति का जन्म किसी व्यक्ति या भगवान से नहीं हुआ था। यह समाज की आर्थिक ज़रूरतों से निकली थी। भगवान को जाति से जोड़ना अंधश्रद्धा है। आज हमें यह समझना होगा कि जाति नहीं, बल्कि इंसानियत और योगदान ही असली पहचान है।
📖 प्रमाण (Proof) :-
- ऋग्वेद (10.90 – पुरुषसूक्त): चार वर्णों का उल्लेख – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
- मनुस्मृति (अध्याय 1, श्लोक 91): वैश्य को कृषि, गोपालन और व्यापार का दायित्व दिया गया।
- महाभारत (शांति पर्व): वैश्य को समाज का पालनकर्ता कहा गया।
- आधुनिक शोध: World History Encyclopedia में भी वैश्य को वेदों से उत्पन्न वर्ण बताया गया है।
👉 ये प्रमाण दर्शाते हैं कि वैश्य जाति किसी भगवान या व्यक्ति द्वारा नहीं बनी, बल्कि प्राचीन ग्रंथों में दर्ज वर्ण व्यवस्था का हिस्सा है।
