मनुस्मृति – श्लोक 272 और जन्मजात जातिव्यवस्था: इतिहास की सच्चाई :
सोचिए! क्या कभी आपने यह महसूस किया है कि हमारे समाज में जन्मजात भेदभाव की जड़ें कितनी पुरानी हैं? कुछ विद्वानों का कहना है कि यह केवल आधुनिक समय की समस्या नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें हजारों साल पुरानी हैं। और अगर हम इतिहास के पन्नों में झांकें, तो हमें एक बेहद विवादित ग्रंथ मिलता है — मनुस्मृति।

विशेष रूप से अध्याय 8, श्लोक 272 में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख है कि समाज में जातियों का विभाजन एक नियत और स्थायी व्यवस्था के रूप में स्थापित किया गया था। इस श्लोक में वर्णित है कि समाज के विभिन्न वर्गों को उनके जन्म के आधार पर अलग-अलग कर्तव्य और अधिकार प्राप्त हैं।
यहाँ सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इस श्लोक ने न केवल सामाजिक जीवन को परिभाषित किया बल्कि यह भी तय किया कि किस वर्ग को समाज में क्या स्थान मिलेगा। जन्म से निर्धारित यह सामाजिक विभाजन आज भी हमारे देश की जड़ें प्रभावित करता है।
लेकिन क्या यह केवल मनुस्मृति का व्यक्तिगत दृष्टिकोण था, या इसके पीछे कोई व्यापक ऐतिहासिक और सामाजिक कारण था?
इतिहासकारों के अनुसार, मनुस्मृति का यह श्लोक उस समय के सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में लिखा गया था, जब जाति आधारित कर्तव्य और कानून समाज को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक माने जाते थे। हालांकि समय के साथ यह व्यवस्था कठोर और अनुचित रूप लेने लगी।
जातिव्यवस्था का ऐतिहासिक प्रमाण :-
श्लोक 272 में लिखा गया है:
“सर्वकर्माणि जन्मना निरूप्य तिष्ठन्ति।”
(सभी कर्म और कर्तव्य जन्म के अनुसार निश्चित हैं।)
यह प्रमाण स्पष्ट करता है कि मनुस्मृति में जातिव्यवस्था को जन्म से स्थायी और अनिवार्य माना गया था, और यह केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि लिखित ग्रंथ के आधार पर संरचित नियम था।
आज जब हम समाज में समानता और न्याय की बात करते हैं, तो यह जानना महत्वपूर्ण है कि इतिहास की ये जड़ें कैसे आधुनिक समस्याओं को जन्म देती हैं।
🔍 ऐतिहासिक प्रमाण: आंबेडकर बनाम मनुस्मृति :-
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 25 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति दहन किया था। यह घटना सिर्फ एक विरोध नहीं थी, बल्कि उस सोच के खिलाफ विद्रोह था जो जाति के आधार पर इंसान की कीमत तय करती थी। अंबेडकर ने कहा था:
“मनुस्मृति ने शूद्रों को इंसान नहीं समझा, और ब्राह्मणों को भगवान बना दिया।”
🧠 निष्कर्ष:
जातिभेद कोई प्राकृतिक व्यवस्था नहीं थी, बल्कि एक लिखित नियम था जिसे समाज ने आँख मूँदकर अपनाया। आज जब हम समानता की बात करते हैं, तो हमें उन ग्रंथों और नियमों को भी समझना होगा जो असमानता की जड़ हैं।
⚡ सोचने वाली बात: क्या अगर हमारे पूर्वजों ने इस नियम को चुनौती दी होती, तो आज समाज अधिक समान और न्यायपूर्ण होता?
