ऋग्वेद का रहस्य : जातिव्यवस्था की जड़ें कहाँ से शुरू हुईं?
क्या आपने कभी सोचा है कि भारतीय समाज में जातिभेद आखिर शुरू कहाँ से हुआ?
क्या यह केवल एक सामाजिक प्रथा थी, या इसके पीछे धार्मिक आधार भी था?
जब हम इतिहास की परतें खोलते हैं, तो हमें एक ऐसा मंत्र मिलता है जो इस प्रश्न का उत्तर देता है। यह मंत्र है – ऋग्वेद का पुरुषसूक्त (मंडल 10, सूक्त 90)। यह वही सूक्त है जिसे अक्सर जातिव्यवस्था की उत्पत्ति का सबसे पुराना धार्मिक आधार माना जाता है।

पुरुषसूक्त और जातिव्यवस्था
पुरुषसूक्त में “पुरुष” नामक एक विराट ब्रह्मांडीय सत्ता का वर्णन है। उसी पुरुष के अंगों से चार वर्णों (या कहें जातियों) की उत्पत्ति बताई गई है –
- ब्राह्मण : पुरुष के मुख से
- क्षत्रिय : पुरुष के भुजाओं से
- वैश्य : पुरुष की जंघाओं से
- शूद्र : पुरुष के पैरों से
यह प्रतीकात्मक व्याख्या समय के साथ समाज में स्थायी हो गई और धीरे-धीरे जन्म आधारित जातिव्यवस्था का आधार बनी। यही कारण है कि विद्वान इस सूक्त को भारतीय जातिभेद की जड़ मानते हैं।
ऐतिहासिक सच्चाई
इतिहासकारों का मानना है कि यह सूक्त वेद का सबसे प्राचीन भाग नहीं है, बल्कि बाद में जोड़ा गया हिस्सा भी हो सकता है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Who Were the Shudras?” में विस्तार से बताया है कि वेदों में वर्ण व्यवस्था जन्म से नहीं बल्कि कर्म से जुड़ी थी। लेकिन समय के साथ इसे जन्माधारित बना दिया गया।
प्रमाण(Proof)
ऋग्वेद – मंडल 10, सूक्त 90 (पुरुषसूक्त) में स्पष्ट लिखा है कि चारों वर्ण एक ही विराट पुरुष से उत्पन्न हुए।
संस्कृत श्लोक:
“ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्, बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः, पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥”
यह श्लोक इस बात का प्रमाण है कि वर्णों का वर्गीकरण वैदिक ग्रंथों से जुड़ा हुआ है।
📜 अंतिम प्रमाण: बौद्ध ग्रंथों में विरोध
बौद्ध ग्रंथों जैसे धम्मपद और सुत्तनिपात में जाति व्यवस्था का विरोध मिलता है। बुद्ध ने कहा था:
“न जन्म से ब्राह्मण होता है, न शूद्र। कर्म ही मनुष्य को महान बनाता है।”
यह विरोध इस बात का प्रमाण है कि वैदिक वर्ण व्यवस्था धीरे-धीरे जन्म आधारित जाति व्यवस्था में बदल रही थी, और बुद्ध जैसे विचारकों ने इसका विरोध किया।
निष्कर्ष
अब सवाल यह है कि क्या यह वर्गीकरण समाज की वास्तविक आवश्यकता थी, या फिर इसे सामाजिक नियंत्रण का साधन बनाया गया?
इतिहास हमें यही सिखाता है कि जातिव्यवस्था जैसी व्यवस्थाएँ समय के साथ बदलती हैं। पुरुषसूक्त का यह मंत्र केवल एक प्रतीकात्मक कथा हो सकता है, लेकिन बाद में इसे वास्तविकता मानकर पूरे समाज पर थोप दिया गया।
👉 यही कारण है कि जब हम जातिभेद की जड़ों की खोज करते हैं, तो हमें सबसे पहले ऋग्वेद का पुरुषसूक्त ही प्रमाण के रूप में मिलता है।
